संस्कृत श्लोकों सहित हिन्दी अनुवाद / भावार्थ
श्लोक 1
ललितलवङ्गलता परिशीलनकोमलमलयसमिरे ।
मृदुलमृगमदसुरभिनवकुसुमकुलधूसरकुञ्जे ॥
भवजलधिगतगमनं किमपि विमृशति न चिरम् ।
व्रजजनसुनयनेषु विभ्रमति हरिरिह जय जय देव हरे ॥१॥
हिन्दी अनुवाद: मलय की कोमल हवा में लता नाजुक बाँहें झुला रही है; नया फूलों वाला वह वन मनोहर है। हरि यमुना तट पर देर तक नहीं ठहरते, वे व्रजवासियों के सुन्दर नयनों में विचरते हैं। जय जय देव हरे।
श्लोक 2
विपिनविपिने परिभ्रमति हरिरुदितमुदितमधुपगणरवरे ।
दयितवयस्यनिवेदितमुदितस्मितमिलितमधुरिपुमुखे ॥
मृगमदतुलितरुचिरनवकमलदलमलिनविपिनतले ।
व्रजजनसुनयनेषु विभ्रमति हरिरिह जय जय देव हरे ॥२॥
हिन्दी अनुवाद: वन-वन में हरि घूमते हैं; उनकी उपस्थिति से मधु-गायकों का हर्ष और जयघोष उठता है। प्रियतमों के सम्मुख उनके मधुर मिलन-स्मित से सब हर्षित हैं। नव-खिले कमल जैसे कोमल पुष्पों से भरे उस वनतल पर उनकी छवि मृगों की मोहिनी-सी है। जय जय देव हरे।
श्लोक 3
स्फुरितकुसुमकुलकुसुमिततलरुचिरकदम्बतले ।
मृदुलतरकुसुमसुगन्धिवहति मलयसमिरे ॥
मिलितशिखिणिशिखिशिरसि विलसन्मणिकाञ्चनपिञ्छे ।
व्रजजनसुनयनेषु विभ्रमति हरिरिह जय जय देव हरे ॥३॥
हिन्दी अनुवाद: खिले फूलों के समूह से सजे सुंदर कदम्ब-वृक्ष के तले मलय की सुगंधित हवा कोमल पुष्प-खण्डों से महक उठती है। उनके सिर पर मोरपंख-मणि की चमक है। व्रजवासी उस दृश्य में हरि को देखते हैं — जय जय देव हरे।
श्लोक 4
मुरलिविलासविलोलकपोलविस्फुरदधरकुटिलस्मितभृते ।
नवरमणीयविलासमृदुलकदम्बकुसुमितविपिने ॥
मृदुलतरकुसुमसुगन्धिसुभगमलयसमिरे ।
व्रजजनसुनयनेषु विभ्रमति हरिरिह जय जय देव हरे ॥४॥
हिन्दी अनुवाद: जिसके ओठों पर मुरली की मधुर तान का खेल झलकता है, गालों पर खिलखिलाता हँसमुख स्मित है — वह मनोहर रूप व्रज के कदम्ब-कुसुमित उपवन में रम रहा है। मलय-हवा में पुष्पों की मधुर सुवास बिखरी हुई है। व्रजजन में वह हरि घूमते हैं — जय जय देव हरे।
श्लोक 5
मुकुलितकरकमलविलसितललितपुलकविभूषिततनवे ।
नवनीलनलिनदलसदृशगात्रसुभगकदम्बतले ॥
चलललितमणिकाञ्चनकाञ्चुललितकुण्डलमणिभूषितशिरे ।
व्रजजनसुनयनेषु विभ्रमति हरिरिह जय जय देव हरे ॥५॥
हिन्दी अनुवाद: खिले हुए कमल-हाथ जैसे कोमल करों और लहराती देह पर अलौकिक रोम-हिलोरें हैं; नव-नील कमल पल्लवों जैसी उनकी देह अत्यंत सुन्दर है। उनके सिर को मोती-मणि से सजे कुंडल सुशोभित करते हैं। व्रज के लोग उनसे घिरकर विचलित हैं — जय जय देव हरे।
श्लोक 6
मणिवलयभूषितकरेण ललितकपोलविलोलस्मितधरिणा ।
नवरमणीयतरतरुणकदम्बकुसुमितविपिनतले ॥
चलललितमणिकाञ्चनकाञ्चुललितकुण्डलमणिभूषितशिरे ।
व्रजजनसुनयनेषु विभ्रमति हरिरिह जय जय देव हरे ॥६॥
हिन्दी अनुवाद: हाथों पर मणि-वलयों से सजी, ललित कपोलों पर खेलती मुस्कान लिये किशोर (कृष्ण) कदम्ब के सुन्दर पुष्पो से भरे उद्यान में हैं। सिर पर सज्जित मणि-मोती के कुंडल और आभूषण उनकी शोभा बढ़ाते हैं। व्रजवासी और सुन्दर नयनों में वे लीन हैं — जय जय देव हरे।
श्लोक 7
सुरभिसुरभिसुगन्धिमलयसमीरसुगन्धिसुमनसि ।
मिलितशिखिणिशिखिशिरसि विलसन्मणिकाञ्चनपिञ्छे ॥
मुरलिविलासविलोलकपोलविस्फुरदधरकुटिलस्मितभृते ।
व्रजजनसुनयनेषु विभ्रमति हरिरिह जय जय देव हरे ॥७॥
हिन्दी अनुवाद: सुगन्धित पुष्पों और मलय-हवा की महक से मन हर्षित है; सिर पर चमकते मणि-सा अलंकरण झिलमिलाता है। मुरली बजाते हुए उनके खेलने वाले ओठों का कोमल-कुटिल स्मित अद्भुत है। व्रजजन उन्हें देखकर माद होकर घूमते हैं — जय जय देव हरे।
श्लोक 8
श्रीजयदेवकवेरिदमुदितमुदारमिह पदमष्टकमिदम् ।
पठति पठति सुजनो यदिह हरिचरणस्मरणपवित्रम् ॥
मृदुलतरकुसुमसुगन्धिसुभगमलयसमिरे ।
व्रजजनसुनयनेषु विभ्रमति हरिरिह जय जय देव हरे ॥८॥
हिन्दी अनुवाद: यह आठ-एकाष्टक (अष्टक) जयदेव कवि का हृदयोद्गारमय पद है। जो साधु इसे पढ़ता है, वह हरि के चरण-स्मरण से पवित्र होता रहता है। मलय-हवा की माधुर्य वही है; व्रजजन उसमें मग्न होकर हरि का स्मरण करते हैं — जय जय देव हरे।
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